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पथ पर चलते चलते

Hindi story


यह कहानी प्यारी सी लड़की अप्पू, जिसके पिता शहीद हो चुके हैं , व एक मध्यम परिवार का लड़का नैतिक के इर्द गिर्द घूमती है । कहानी में मुख्य रूप से दूसरी महिला पात्र शिवन्या भी बेहद महत्वपूर्ण किरदार निभाती है 

आइये देखने के लिए लेते हैं कहानी का रुख ।

पात्र परिचय : 

अप्पू :- कहानी की मुख्य महिला पात्र गोल मुँह हल्की सुन्दर छवि मनमोहक आँखे

नैतिक :- एक मध्यम परिवार का लड़का कहानी का पुरुष मुख्य पात्र 6 फुट का कद हल्का सांवला सुन्दर सुडौल शरीर

शिवन्या :- अप्पू की अजीज दोस्त लम्बा सफेद चेहरा कंजी आँखे लगता है जैसे कोई परी हो 

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पर्दा उठता है |

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वो नदी किनारे बैठी थी और उसके पैर नदी मैं डूबे हुए थे । रात का पहर था यही घड़ी में 9 बजे का समय होगा यकायक वो कहीं खोई हुई थी कि अचानक उसके आगे एक द्रश्य दिखा बिल्कुल हूबहू ठीक वैसा ही जैसा वो सोच रही थी , जिसे देख अचानक वो चौंक गई । असमंजस में पड़ी अप्पू घर आकर सो जाती है । सुबह होती है, पर अब भी अप्पू कुछ खोई - खोई सी है । कुछ तो हुआ था कल रात जो वो सबसे छुपा रही है । उसकी माँ उसके चेहरे के हाव-भाव देखकर समझ जाती है और अप्पू से पूछती है :-

माँ :- क्या बात है अप्पू  सब ठीक तो है ना, तुम कुछ परेशान सी लग रही हो ।

अप्पू :- कुछ भी नहीं माँ, सब ठीक है ।

माँ :- बेटी के सर पर हाथ सहलाते हुए । मैं तेरी माँ हूँ तेरा दुख दर्द समझती हूँ बता अब हुआ क्या है कुछ तो है जो तू छुपा रही है।

अप्पू :- (आँखों में आँसू हैं सोचते हुए) माँ कुछ नही बस ऐसे ही ।

उस रात ने मानो जैसे अप्पू को शांत सा कर दिया हो। सबको दिखाने के लिए वो हँसती, पर अन्दर से जैसे मायूस सी हो गई थी वो । पता नहीं ऐसा क्या देखा था उसने उस रात।शायद कुछ तो था जो उसे कचोट रहा था मन ही मन में । कहते हैं न पुराना जख्म दर्द बहुत देता है। उसके पिता के मरने के बाद से एक माँ ही तो थी जो उसका एकमात्र सहारा थी ,तो कैसे वो कर सकती थी उन्हें दुखी ।

अकेले कमरे में पड़ी अप्पू कुछ सोच ही रही थी कि अचानक फोन की घंटी बजती है

टिरिन टिरिन टिरिन टिरिन 

अप्पू अब भी कहीं खोई सी है । 

माँ:- अरे देख तेरा फ़ोन कब से तुझे आवाज दे रहा है उठा भी ले ।

(सोचते हुए ये लड़की भी न)

अप्पू फोन उठाती है। पर कुछ बोल नहीं पाती है

फिर बड़ी हिम्मत करके

अप्पू :- हेलो 

किसी लड़की के बोलने की आवाज

हेलो (सन्देहमयी संगीत) 

(सुनते ही जैसे पहाड़ से टूट गया हो अप्पू फोन रख देती है दरवाजा बंद करते हुए)

चुपके से सिसक सिसक रोना शुरू कर देती है

वही बीते हुए दिन उसे कुछ याद से आ रहे थे जैसे उस आवाज से कोई पुराना रिश्ता रहा हो । आते भी क्यों न वो उसकी बेहद अजीज दोस्त शिवन्या का फोन था जो शायद सालों के बाद आया था । गुस्से में फोन काटकर बराबर में टेबल पर रखते हुए अब याद आई होगी इसे । फिर कुछ पलों को याद करती है । 

सोचती कितने अच्छे थे वो दिन साथ बिताई यादेँ बहुत कुछ छूट गया उफ याद करती है हर वो पल । अचानक उसे एक किस्सा याद आता है ।

हाँ बात उन दिनों की है जब अप्पू और उसकी दोस्त शिवन्या साथ साथ पढ़ा करती थीं । और दोस्ती गहरी होती भी क्यूँ न उन दोनों के पिता भी बेहद करीबी दोस्त थे ।

हाँ अप्पू और शिवन्या के पापा एक ही बैच में सेना में काम करते थे । साथ साथ पढ़ते हुए एक साथ दोनों सेना में भरती जो हुए थे। दोनों परिवारों में बहुत प्रेम था इस कारण अप्पू अक्सर कर शिवन्या के घर आया जाया करती थी ।सैनिक स्कूल में पढ़ते हुए दोनों बच्चियों को महज एक टूर पर जाना हुआ । 

वाह क्या सुन्दर जगह थी खूबसूरती देखने मे ऐसी लगती थी मानो जग जीत लिया हो।

चारों तरफ हरियाली वो ऊँचे बर्फ की चादर ढके पहाड़ लुभावना मौसम मानो आकर्षित कर रहा था।वहीं उन्ही पहाड़ियों के पास एक सुन्दर सी बसती थी। जहाँ कुछ एक घर थे सभी लोग गाँव की तरफ बढ़े कि अचानक अप्पू की नजर एक लड़के पर पड़ी हल्का मध्यम शरीर , नुकीली नाक पतला कठीला शरीर , लग रहा था अप्पू कहीं खो गई है।

शिवन्या :-( मजाकिया सुर में ) ओये पागल तो न हो गई तू क्या उसे घूरे जा रही है पसंद आ गया तो बात करूँ तेरे लिए। 

अप्पू :- चल पागल कुछ भी बोलती रहती है। 

(पर नजरें अब भी वहीं लगी हुई थी लग रहा था जैसे कोई प्यासा पानी की तलाश में एकटक निहारे जा रहा हो। )

कोई 15 दिन के लिए आये इस टूर में बच्चों के दिल में पहाड़ों की हसीन वादियों के बीच बसा ये छोटा सा गाँव अपनी सुंदरता का बखान कर रहा था वैसे तो अप्पू को अक्सर कर कहीं न कहीं घूमने जाना ही होता है पर ये सफर कुछ तो खास था शायद बहुत ही ज्यादा ।दिन बीत रहे थे रोज कहीं न कहीं घूमने जाना होता था । अक्सर कर अप्पू अपनी दोस्त के साथ ठीक 5 बजे एक पहाड़ी पर आया करती थी । दरअसल नैतिक पास की पहाड़ी पर अक्सर पशुओं को चराने लाया करता था । बर्फ के कारण बहुत कठिनाई होती थी तथापि एक पहाड़ी थी जहाँ अक्सर कर चरवाहे पशुओं को चरा ले जाया करते थे । देखते देखते कोई 5 दिन बीत गए । शिवन्या अब सब समझ चुकी थी । नैतिक भी अक्सर देखता था एक लड़की उसका पीछा कर रही है । एक दिन नैतिक ने सोचा आज वो पशुओं को चराने नही जाएगा । कोई 5 बजे का समय हुआ

अप्पू :- शिवन्या यार चल न कितना टाइम लगाती है । 

शिवन्या :- हाँ हाँ मैं तो टाइम लगाती ही हूँ 

अप्पू :- ठीक है ठीक है ज्यादा मत इतरा

शिवन्या :- अच्छा कमीनी मैं इतरा रही हूँ 

( हल्की तीखी नोंक झोंक के बाद सब शांत होता है) 

दोनों बड़ी तेजी से अपने तंबू से बाहर निकल कर देखते हैं

अप्पू :- यार शिवन्या वहाँ कोई न दिख रहा देख न 5 बज गए

शिवन्या :- मैं क्या करूँ । तुझे कौन चाहिए वैसे

अप्पू :- यार जो पशु चरने आते हैं कितने अच्छे लगते हैं , हैं ना

शिवन्या : - चल पागल मत बना सब समझती हूँ बच्ची नही हुँ मैं

अप्पू :- मजाकिया स्वर में हाँ मेरी माँ माफ कर अब

(वहीं सारा नजारा वो लड़का छुप कर देख रहा होता है कि यकायक शिवन्या की नजर पडती है )

शिवन्या :- ले आ गया सिरफिरा 

अप्पू :- चल कैम्प चलते हैं न शर्माते हुए एक पर्चा चुपके से छोड़ देती है। 

नैतिक उठाकर देखता है उसमें उस लड़की का नम्बर होता है ।

धीरे धीरे बात शुरू हो जाती हैं । हर रोज वो वहीं पहाड़ पर मिलते हैं कई दिन बीत चुके हैं । नैतिक ने दोनों को अपना सारा गाँव घुमा दिया । उसके खेत घर सब । दोंनो के बीच एक अनोखा प्यार का रिश्ता बन चुका है । इधर कैम्प का आखिरी दिन अप्पू कुछ उदास सी है । परेड ग्राउंड में बच्चों की परेड और ड्रिल कराने के बाद बच्चों को आज कुछ खास काम के लिए गाँव के लिए जाना है शायद या तो कोई जागरूकता अभियान चलाने वाले हैं या कोई जानकारी लेनी होगी । कोच ने कहा है मुझे यहाँ की सारी जानकारी चाहिए । विद्यालय , रहने का ढंग , भेषभूषा , बोली शौचालय इत्यादि । अब क्या थे बच्चे निकल दिए करने इकठ्ठा जानकारी को । अप्पू के अन्दर आज वो उत्साह नही है वो कहीं खोई खोई सी है जैसे कुछ बेहद खास है जो उससे छूटता जा रहा है । फिर से दोनों मिलते हैं । यार अप्पू ये हमारी आखिरी मुलाकात होगी क्या ? क्या हम फिर कभी मिल पायेंगे हल्का दबे स्वर में बोलता है लग रहा था मन ही मन रो रहा हो। वहीं पास ही एक चाय की टपरी थी । नैतिक कहते हुए चलो चाय पीते हैं। 

भैया दो चाय देना 

चायवाला :- जी जरूर ! ऐसी चाय बनाऊँगा हमेशा याद रहेगी

अप्पू :- बुदबुदाते हुए कुछ कहती है । फिर हल्के दबे स्वर में चाय तो याद रहेगी ही जब पिलाने वाले इतने अजीज हों।

नैतिक :- अच्छा जी मजाकिया लहजे से

लो जी गर्मागर्म चाय 

शीतलहर के बीच गरमागरम चाय का मजा ही कुछ और होता है। हल्की हल्की हवाओं के बीच दोनों एक दूसरे की आँखों में देख रहे हैं मानो लग रहा है जैसे कोई बात है जो जुबाँ तक आते आते थोड़ा रुक सी रही थी । आज अप्पू अकेली ही आई थी शिवन्या ने ही कहा था दरअसल क्योंकि ये आखिरी दिन था तो अच्छे से मिल भी लेगी । एकटक दोनों आँखों मे आँखे डाले दोनों के हाथ एक दूसरे के हाथ में पड़े हुए थे । लग रहा था आँखों ही आँखों मे इश्क फरमाया जा रहा हो। 

यकायक चाय वाला आता है साहब चाय ठंडी हो रही है नैतिक के मुँह से निकल गया अभी कहाँ

अप्पू :- ओ मजनू साहब सच ही तो कह रहे हैं भैया 

नैतिक :- अरे मैं तो भूल ही गया था । 

हाँ पिओ न चाय 

तभी अचानक से शिवन्या दौड़ी दौड़ी आती है यार अब चल सब इंतजार कर रहे हैं चलने का आधी प्याली चाय की वहीं मेज पर रखी रह जाती है नैतिक उस चाय को पीते हुए वाह क्या स्वाद है चाय का । जैसे अप्पू की तरफ इशारा किया हो कोई अपने प्यार के इजहार का कि हम फिर मिलेंगे जरूर ।

समय बीतता है अप्पू और शिवन्या के पिता का ट्रान्सफर हो जाता है सीमा पर। हाँ क्योंकि वहाँ गोलीबारी हो रही है । बड़े बहादुर होते हैं सैनिक भी जब भी जरूरत आन पड़े चल देते हैं सीना तान के गोली खाने । किस्मत का खेल भी देखो अपनों को मिलाने के लिए नए नए खेल रचती है। जिस जगह उनका ट्रांसफर हुआ वो महज नैतिक के गाँव से 1 किमी दूर थी यहीं पास मे एक बॉर्डर था जहाँ कुछ घुसपैठिये घुस आए थे । तो गाँव को खाली करा लोगों को निकालकर बंकर में शिफ्ट कराने का आदेश दिया गया । दोनों तरफ की गोली बारी में अप्पू के पिता बुरी तरीक़े से घायल हो गए थे । पर फिर भी वो लड़ते रहे। अपनी आखिरी साँस तक, उन्होंनें अपना धर्म निभाया । उन्होंने आतंकियों को तो मार गिराया, पर देश के लिए लड़ते-लड़ते वो शहीद हो गए ।

उनकी शहादत की खबर जब उनके घर पहुँची तो अप्पू और उसकी माँ की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई । जैसे-तैसे उन्होंने इस सच को स्वीकार किया । कुछ दिन बीत गए । अप्पू अभी तक अपने पिता की मृत्यु के दुख से उभरी भी नहीं थी कि, उसे पता चलता है कि जिस गाँव के आस-पास गोलीबारी हुई थी, वो नैतिक का ही गाँव था । यह जानकर उसने तुरंत नैतिक को ढूँढने की कोशिश की। उसने सबसे पूछां, पुलिस वालो से भी, यहाँ तक की उस गाँव में जाकर भी देखा । पर नैतिक का कुछ पता नहीं चला । सबका यही कहना था कि आतंकी हमले में सब मारे गए । इन सबसे अप्पू और उदास हो गई । और वो अपनी माँ को लेकर वहाँ से  कहीं दूर चली गई, जिसके बारे में शिवन्या भी कुछ नहीं जानती थी । एक हमले ने, अप्पू की पूरी दुनिया ही बदलकर रख दी । अब तो जैसे अप्पू मुस्कुराना ही भूल चुकी थी । इस बात को बहुत समय गुज़र चुका था । तभी अचानक एक दिन उसकी सहेली शिवन्या का फोन आता है :-


अप्पू :- हेलो! 

शिवन्या  :-  अप्पू, मैं शिवन्या। कैसी हो तुम। अचानक से कहां गायब हो गई थी । कितना ढूँढा, तुम्हें मैंने। बढ़ी मुश्किल से कहीं से तुम्हारा नम्बर मिला। अंकल के बारे में सब पता है मुझे अप्पू। और नैतिक वो कैसा है अप्पू।

(शिवन्या के मुँह से नैतिक का नाम सुनकर, अप्पू स्तब्ध हो गई, उसकी आँखों में आँसू आ गए और उसने फोन रख दिया) 


कुछ दिनों बाद अप्पू ने ,खुद शिवन्या को फोन लगाया और सारा वाक्या समझाया । अप्पू की बात सुनकर शिवन्या भी बहुत दुखी हो गई और वो शिवन्या से मिलने उसके घर आई । उसके आने से जैसे अप्पू को एक नई हिम्मत मिल गई हो। तभी अप्पू ने शिवन्या को बताया कि, उसने कुछ दिनों पहले नदी किनारे नैतिक को देखा ।

यह सुनकर शिवन्या चौंक गई । 

शिवन्या :- ये कैसे हो सकता है अप्पू।तूने किसी और को देखा होगा ।

अप्पू :- नहीं शिवन्या वो नैतिक ही था । उसे देखकर मैं कुछ समझ नहीं पाई और वहाँ से तुरंत घर  आ गई । पहले तो मुझे भी यहीं लगा कि यह मेरा वहम है । पर वो मुझे बार-बार दिख रहा है शिवन्या। और हर बार वहम कैसे हो सकता है ।

शिवन्या :- ठीक है अप्पू,तो फिर हम आज रात फिर से उसी नदी के किनारे जाकर देखते है ।

अप्पू :- ठीक है ।

(शिवन्या और अप्पू दोनों उस रात  नदी के किनारे जाते है) 

और अप्पू को नैतिक फिर से दिखता है, पर इस बार वो भागती नहीं है ,बल्कि उसके पास जाकर देखती है और वो हैरान हो जाती है और शिवन्या को बुलाती है । वो  सच में नैतिक ही था ।

अप्पू :- नैतिक,तुम जिंदा हो। तो अब तक कहां थे तुम।कितना ढूँढा मैंने तुम्हें । 


नैतिक फिर अप्पू और शिवन्या को पूरी कहानी बताता है कि कैसे वो बचा और कब से वो अप्पू को ढूँढ रहा है । पर उस हमले में उसका पूरा परिवार खत्म हो गया था ।

नैतिक उन दोनों को बताता है कि उसे पता चला है कि कुछ आतंकी फिर से हमला करने के लिए, यहां के कुछ इलाकों में घुसपैठ कर रहे है । और वो अप्पू और शिवन्या से कहता है कि उसे उन दोनों की मदद चाहिए। ताकि वो आतंकी पकड़े जाए और इस बार किसी का परिवार ना उजड़े। अप्पू और शिवन्या, दोनों मान जाती है ।

वो तीनों पुलिस की मदद लेते है और इस मिशन में जुट जाते है । और इसी मिशन में छानबीन के दौरान उन्हें कुछ गुप्त सूत्रों से खूफिया जानकारी मिलती है और वो पुलिस के साथ वहाँ पहुँचते है । पहुँचकर देखते हैं कि तो सबकी आँखे भौचक्की रह जाती हैं | वहां उन्हें भारी मात्रा में RDX व अन्य सामिग्री बरामद होती है पर आतंकवादी वहाँ से जा चुके होते हैं | किसी को समझ नही आता कि दरअसल जानकारी किसने दी कि यहाँ रेड पड़ने वाली है | सारा प्रशासन अलर्ट पर है कि अचानक पता लगता है कि नैतिक ने शिवन्या को किडनैप कर लिया |  क्यूँकी अप्पू के पिता तो शहीद हो चुके थे तो उनसे कोई फायदा नहीं होता पर शिव्न्य के पिता अब भी सेना में बड़ी पोस्ट पर हैं उनका उस घटना के बाद प्रमोशन हो गया था | एवज में बतौर फिरौती एक आतंकवादी जो मुठभेड़ के दौरान पकड़ा गया था उसे बाइज्जत वरी किया जाये | इस माँग के बाद मीडिया में उसका चेहरा छा जाता है क्यूंकि कोई भी नहीं जानता था कि नैतिक आतंकी गिरोह में शामिल हो गया है इसलिए उसने अप्पू और शिवन्या के साथ सम्बन्ध बनाये थे | आतंकवादी को छोड़ा जाता है उसके साथ नैतिक भी उनके साथ उनके ठिकाने पर पहुँचता है | चूँकि वो सबका विश्वास जीत चुका है | बड़े आतंकवादी को जो छुडवाया है | अब उसकी ट्रेनिंग कराई जाती है | दीवाली के मौके पर आतंकवादी कुछ बड़ा करने वाले हैं | मानव बम्ब बनाये गए हैं | और भी तैयारियां जोरों पर हैं इधर अप्पू के मन में बेहद आक्रोश है | वो अब भी सोच रही है नैतिक ने ऐसा क्यूँ किया | फिर अचानक गुप्त सूत्रों के हवाले से एक खावर लीक होती है कि दीवाली पर बहुत बड़ा धमाका होने वाला है तथा आतंकवादीयों के पास के इलाके में छिपे होने की खबर से हडकंप मच जाता है मिशन पर कुछ ख़ास सैनिक भेजे जाते हैं | गोलीबारी बराबर चल रही है | नैतिक अब आतंकवादी खेमे से भी फरार है इधर एक अनजान नंबर से आतंकवादियों की सारी गतिविधियाँ सेना में पहुंचाई जा रही हैं | उस अनजान नम्बर की मदद से आतंकवादियों का सारा प्लान चौपट कर दिया जाता है वादी के सारे आतंकवादी मर चुके हैं | बाद में सभी न्यूज़ पेपर में मीडिया में खबर छपती है एक बेटी ने अपनी बाजी दाँव पर लगाकर की अपने देश की रक्षा | सभी के लिए बेहद चौंकाने वाली खबर थी क्यूंकि वो और कोई नही अप्पू ही थी जो एक ख़ुफ़िया मिशन पर थी | दरअसल भारतीय सेना को आतंकवादी गतिविधियों की शंका पहले से ही थी जिसके लिए इन्होने कुछ लोगों की एक खास फ़ोर्स तैयार की थी जिसकी जानकारी केवल आलाकमान अधिकारीयों को थी | यहाँ तक कि मिशन में शामिल सेना के जवान भी नहीं जानते थे कि उनके साथ कौन कौन शामिल है | इधर सूत्रों के हवाले से पता चलता है कि जिसने भी आतंकवादी गतिविधियों की जानकारी दी थी वो और कोई नहीं नैतिक ही था | जिसे खास तौर पर इसी बात के लिए नियुक्त किया गया था कि वो उन सभी गतिविधियों पर नजर रखे जो देश के खिलाफ होने वाली हैं चाहे उसके लिए उसे उनका भरोसा ही क्यूँ न जीतना पड़े |

अप्पू को नैतिक और नैतिक को अप्पू के बारे में बिल्कुल भी पता नही था | पर अप्पू को शक था कहीं नैतिक आतंकवादियों के साथ मिला हुआ था नही है जिस कारण से उसने नैतिक का पीछा शुरू किया था | धीरे धीरे उसे विश्वास तो हो गया था पर उसने फिर भी खुद के बारे में पूरी बात नहीं बताई  |

कहते हैं न फर्ज का पक्का इंसान कभी फर्ज से गद्दारी नहीं करता

थकी हारी अप्पू आज फिर से वहीँ एक बार उसी पहाड़ी पर घुमने गई |

तभी यकायक उसे नैतिक दिखा हाईकमान से सारी बात पता लग चुकी थी


अप्पू :-  पथ पे चलते चलते एक ख्वाब मेरे मन में आया कि क्यूँ न एक बार एक कप टपरी वाले की चाय पी जाये |

नैतिक :- हँसकर ! यहीं रह जाओ हमेशा चाय पियेंगे इसी टपरी पर


हँसी मजाक के साथ पर्दा गिरता है

By Akash Raghav and Silky Jain


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