Ticker

6/recent/ticker-posts

क्या सचमुच हम आजाद हैं? - श्रेया गुप्ता

क्या सचमुच हम आजाद हैं? - श्रेया गुप्ता with a prison and hands and the logo of Peaceful Writers International


यह कहानी सच्ची घटना पर आधारित हैं। 

इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं हैं। इस कहानी के माध्यम से  लेखिका केवल देश के नागरिकों को अपनी जिम्मेदारी, अपने कर्तव्य और मातृभूमि की रक्षा के प्रति जागरूक करना चाहती हैं। 

          »»————>✿<————««


आज स्वतंत्रता दिवस...हमारी आजादी का दिन। 

क्लास में जाकर आखिरी बेंच पे सोने वाली मैं, आज 6 बजे सर्वगुण संपन्न वाली तैयार थी आखिर एक दिन वाली देशभक्ति जो जागी थी। 

हाथ में तिरंगा ले घर से निकली बड़े जोश में...इंकलाब जिंदाबाद...इंकलाब जिंदाबाद...नारों से सजी गूँज में, रैली की चलती भीड़ में, 

मेरे कदम अचानक रूक गए...

वो ना मेरे जूते का फीता खुल गया था, उसको बाँधकर ऊपर उठी तो पता चला कि सब आगे निकल चुके हैं और मैं सबसे पीछे छूट गयी हूँ।

हम्म...फिर मैं धीरे-धीरे चलने लगी। 

सामने देखा एक प्यारी-सी लड़की अपनी गाय के साथ अपने ही धुन में जा रही है जैसे  जिंदगी ने उसे आज सारी खुशियाँ दे दी हो। 

बाबा...! 

वो अचानक जोर से चिखी। 

रूको...रूको...गाड़ी रोको, बचाओ। 

कोई हैं?? हेल्प...प्लीज हेल्प। 

मैं डर से पेड़ के पास छुप गयी। 

मदद तो करना चाहती थी पर कदम घबराहट और डर के मारे आगे नहीं बढ़ पाए और समझ नहीं आ रहा था कि करूँ भी तो क्या?? 

सामने से दौड़ते हुए कोई आया और सिर पीटकर रोने लगा, 

लाडली...लाडली। 

ओ...लाडली उसकी गाय का नाम हैं और

वो आदमी उस प्यारी-सी गाय मतलब लाडली का मालिक हैं जो अभी अभी उसे खरीद कर आया था। उस गाड़ी ने उसे धक्का मार दिया और उसका बुरी तरह से ऐक्सिडेंट हो गया। 

उनकी सहायता करने वाला वहाँ कोई नहीं था। वो लड़की गुस्से में...वो गाड़ी के पीछे दौड़ पड़ी।

रोको...गाड़ी रोको...! 

गाड़ी रूक गयी। 

ये देख हल्की-सी तसल्ली मुझे भी हुई। 

वो लोग कुछ बातें कर रहे थे, शायद मशला सुलझ गया। 

मैं वहाँ से चली गई। 


दूसरी सुबह जब मैं उठी पापा हॉल में हर रोज की तरह पेपर पढ़ रहे थे। 

गुड मॉर्निंग पापा! 

मॉर्निंग! 

  “अच्चुतम केशवं कृष्ण दामोदरं:”

हैलो! जी जी नमस्कार। 

लो पापा का तो कॉल आ गया चलो देखते हैं आजकल क्या क्या हो रहा हैं। 


“भारत के नीरज चोपड़ा अभिनव बिंद्रा के बाद दूसरे इंडिविज़ुअल एथलीट बन गए हैं, जिन्होंने ओलंपिक चैंपियन का खिताब अपने नाम किया है।”


वाह...वाह क्या बात हैं। 


“पुणे में 13 लोगों ने एक 14 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार किया क्योंकि उसने अपनी गाय की दुर्घटना के लिए उनसे बहस की!”


हाथ से पेपर गिरा, आँखों में आँसू और बस एक ही ख्याल ये तो वही हैं। 

 शायद इस हादसे का मुझपे काफी ज्यादा असर हुआ था। 

अँधेरी रात के साए में एक ख्याल ने मेरे जहन में दस्तक दी। 

“हर साल अपनी आजादी का जश्न मनाते हैं हम, अपनी स्वतंत्रता का परचम बड़े शान से लहराते हैं हम।” 

सब कहते हैं हमेशा दिल की बात सुननी चाहिए, यूँ तो मैंने भी कई हादसे सुने हैं पर आज उस हादसे को अपने आँखों से देखकर उनके दर्द को महसूस करने के बाद पहली बार दिल ने मुझसे एक सवाल पूछा जिसका मेरे दिलों-दिमाग पर थोड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। 


क्या सचमुच हम आजाद हैं??? 


एक तरफ जहाँ संपूर्ण संसार में भारत की प्रशंसा हो रही है। नीरज चोपड़ा, रवि कुमार दहिया, सेखोम मीराबाई चानू जैसे नागरिक जो हमारे देश का नाम ऊँचाईयों पर ले जा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ हमारा हमारी जन्मभूमि पे रहना भी मुश्किल हो गया हैं। 

इस सवाल के बोझ तले मैं काफी परेशान रही कुछ दिनों तक...पर कहते हैं ना जिसपे पड़ती हैं उसका दर्द बस वही समझ सकता हैं। 

फ्रेंड, ऑउटिंग, मस्ती, खाना, सोना और फोन चलाने के चरम सुख को छोड़कर मैं कहाँ इन बातों पर ज्यादा दिनों तक ध्यान देने वाली थी। 

उस सवाल के जबाब में जुवां पर हाँ का स्टिकर तो चिपका हुआ ही था मैंने भी वो एक दिन वाली देशभक्ति के जोश में बड़े गुरूर से कहा — हाँ! 

और उस सवाल को अनदेखा करते हुए फिर से अपनी दुनिया में खो गयी। 


अगले दिन —

मम्मी : अच्छा हुआ आप आ गए। इसकी जिद्द तो खत्म ही नहीं होती। आपने ही इसको सिर पे चढ़ा रखा हैं। मैं तो थक गयी हूँ समझाते समझाते। देखिए, जब से स्कूल से घर आई है कमरे में गुस्से में बैठी है। 

पापा मेरे कमरे में आए और 

अले! का हुआ बच्चा? कुछ चाहिए? 

मैं तुरंत उनके पास गयी और कहा 

पापा मुझे है ना...

क्या???

आप मना नहीं करेंगे ना??

नहीं बच्चा बोलो तो!

मुझे भी एक पैट चाहिए। 

पापा, अब तो हर कोई पैट रखता है कितना प्यारा कितना क्लासी लगता हैं ना? 

पर मम्मी को देखो ना पापा... 

पापा प्लीज ना 

अच्छा ठीक हैं हम भी पैट रख लेंगे। 

ये बल्ले बल्ले!!! 

थैंक्स पापा। आई लव यू! 

अगले दिन ही पापा एक पैट ले आए और हमने उसका नाम ऑवेली रखा। 

हमारी हैप्पी फैमिली। 

हम सब अच्छे से रह ही रहे थे कि

कुछ दिनों बाद एक खबर सुनी—

“आंध्र प्रदेश के पश्चिमी गोदावरी जिले के एक गांव में 300 से अधिक कुत्तों को जहर देकर मार डाला गया और उनके शवों को एक गड्ढे में दबा दिया गया और साथ ही हैदराबाद में एक व्यक्ति ने एक बिल्ली के बच्चे को जिंदा जला दिया और वो इस घटना को रिकॉर्ड कर रहे थे अपने मजे के लिए और उस मासूम की दर्दनाक मौत हो गई।”


क्या मजाक है ये? इंसानियत नाम की चीज है या नहीं? कोई ऐसा कैसे कर सकता है? वो भी तो जीव हैं। 

आज फिर उसी एक सवाल ने मेरे जहन में दुबारा दस्तक दी। 


क्या सचमुच हम आजाद हैं??? 


आज ये सवाल इंसानों के लिए नहीं बल्कि जानवरों के लिए था। उन्हें भी ईश्वर ने हमारी तरह अनमोल जीवन दिया हैं और हमें उनको प्रताड़ित करने या उनकी हत्या करने का कोई हक नहीं है। 

पर आज उस सवाल के जबाब में जुवां पर हाँ नहीं था बल्कि मैं ये सच मान चुकी थी कि आजादी का तो पता नहीं पर जहाँ जानवर सुरक्षित नहीं हैं वहाँ इंसानों के सुरक्षित होने की कल्पना करना भी कोई पाप से कम नहीं। 

पर इस बार मैं इस हादसे को सुनके गुस्सा कम और डरी हुई ज्यादा थी और उसकी वजह थी मेरा असिमित प्यार ऑवेली के लिए। अब मैंने उसका ज्यादा बाहर आना जाना, बाहर का खाना, ये सारी चीजें बंद कर दी थी। 

ना चाहते हुए भी पाबंदी तो लगा दी पर मेरा डर भी तो लाज़मी था। 


और एक दिन—

माँ...मैं आ गयी। ऑवेली कहाँ है? 

गार्डन में ही तो खेल रही थी। 

ओ ठीक है, मैं लेके आती हूँ। 

ऑवेली...ऑवेली कहाँ हो तुम? 

यूँ तो मेरी आहट भी पहचान लेती है लगता है परेशान कर रही है मुझे। 

ठीक है तुम मत आओ मैं सारा चॉकलेट अकेली ही खा लेती हूँ फिर भी उसकी आहट तक नहीं आई । 


माँ...माँ...माँ 

क्या हुआ क्यूँ चिल्ला रही हो इतना? 

माँ! ऑवेली नहीं मिल रही। 

वहीं कहीं होगी आराम से ढूँढ़ो मिल जाऐगी। 

मैंने हर जगह देख लिया वो कहीं नहीं है। 

पापा को फोन लगाओ। 

पापा ऑवेली नहीं मिल रही, आप जल्दी से आ जाओ । 

फिर तुरंत हम पुलिस स्टेशन गए। 


दो दिन हो गए और अब तक कोई खबर नहीं आई। मेरा डर सच होता हुआ लग रहा था। 

मन में तरह तरह के बुरे ख्याल। 

पापा ऑवेली मिल जाएगी ना? 

हाँ, बच्चा।  

तुम फ्रिक मत करो हम हैं ना। 


अगली सुबह जब पापा ने न्यूज़ चैनल ऑन किया। 

आज की खबर दिल झकझोरने वाली है पवई के हीरानंदानी गार्डन से कुछ दूर नौ साल की एक महिला कुत्ते के साथ बलात्कार, उसके गुप्त अंग में डंडा डालकर गंभीर रूप से घायल कर दिया गया और मरने के लिए छोड़ दिया गया। हमारे सूत्रों के अनुसार पता चला कि उस कुत्ते के गले में एक पट्टा था जिसपर “Lisa's Veli” लिखा हुआ हैं। 


पापा और मैं बिना कुछ बोले नंगे पाँव दौड़े।


ऑवेली उठो, देखो हम आ गए तुम्हें कुछ नहीं होगा। मैं तुम्हारा ध्यान नहीं रख पाई, सॉरी ऑवेली उठो ना। 

ऑवेली हमें छोड़ कर जा चुकी थी और मैं बेहोश होकर गिर गई। आँखें खुली तो अपने कमरे में थी पर अपने होश में नहीं। ये एक सदमे की तरह था। 

“जब हम कोई हादसा सुनते हैं तो हमें बुरा लगता है अफ़सोस होता हैं पर बस हम उन्हें सहानुभूति देते हैं और वही जब हमारे साथ होता है तब हमें अंदाजा होता है कि अपनी आँखों से मौत देखना तिल-तिल कर मरना किसे कहते हैं!” और  जैसे मैं उसका दर्द सबसे ज्यादा  महसूस कर पा रही थी। 

और समझ आया कि “गलत दूसरों के साथ हुआ हो या खुद के उसके खिलाफ आवाज जरूर उठानी चाहिए।” 


पुलिस स्टेशन के चक्कर काटते-काटते, कितने रात बीत गए एक सुकून भरी साँस भी नहीं ली पर आज राहत मिली अखबार पढ़कर। आज ऑवेली की रूह को शांति मिली होगी। 

“महिला कुत्ते के साथ बलात्कार करने के आरोप में 60 वर्षीय व्यक्ति गिरफ्तार।”


अगली सुबह —

अभी यहाँ रहना बहुत मुश्किल है लिज़ा के लिए हम कुछ दिनों के लिए उसे बाहर भेज देते हैं। 

हाँ आप सही कह रहे हैं लिज़ा के पापा। 

लिज़ा यानि कि मैं अगले ही दिन वहाँ से चली गई। 

मैं और भाई बाहर अकेले रहने लगे। 


एक दिन अचानक पुलिस हमारे शहर आई और सबसे पूछताछ करने लगी पर सब लोगों ने कहा हमें इसके बारे में कुछ नहीं पता। 

पुलिस सबको धमका कर वहाँ से चली गयी। 

और ये बात मेरे बरदाश्त से बाहर थी कि सबने झूठ क्यूँ बोला? जब वो गलत है तो गलत के खिलाफ आवाज उठाने में कैसा डर? जब पुलिस हमारे साथ हैं हमारी सुरक्षा के लिए फिर सब क्यूँ चुप हैं? 

और जवाब में मुझे यही मिला कि 

वो बहोत खतरनाक लोग है, ये इलाका उनका है। तुम्हें ज्यादा सच के लिए उड़ने की जरूरत नहीं हैं। अगर हम उनके खिलाफ गए  तो वो हमारा स्वर्गवास करवा देंगे। 

बेहतर होगा तुम भी अपना मुँह बंद रखो। 

पर मैंने थाने जाके सब सच बोल दिया और मेरी स्टेटमेंट दर्ज हो गई।


अगले दिन कुछ लोग मेरे घर आए। 


कौन है आप लोग? 


वही जिसके खिलाफ तूने गवाही दी है चुप-चाप जाकर अपना बयान वापस ले वरना तेरा और तेरे भाई का ऐसा हाल करूँगा कि मौत की भीख माँगोगे तुमलोग।


मैं तुम्हारी खोखली धमकी से नहीं डरने वाली। मैं कभी जुर्म का साथ नहीं दूँगी। 


एक बार फिर से सोच ले तुझे अंदाजा भी नहीं हैं हम तेरे साथ क्या कर सकते हैं। 


फिलहाल वो चले गए। 


अगले दिन—


लिज़ा तुमने पेपर पढ़ा? 

मुझे डर लग रहा है कहीं ये एक स्टेटमेंट हमपे भारी ना पड़ जाए! 


अरे यार, कुछ नहीं होगा। 

तू मेरा भाई होके डर क्यूँ रहा है? 

अब उनके डरने की बारी हैं, जिन्होंने गलत किया है। 

ला, दिखा क्या लिखा है पेपर में? 


“गुरदासपुर जिले के डेरा बाबा नानक सेक्टर में भारत-पाकिस्तान सीमा पर 40.8 किलोग्राम हेरोइन बरामद की गई।

हेरोइन के अलावा 180 ग्राम अफीम और दो प्लास्टिक पाइप भी जब्त किए गए।  भारतीय तस्करों की एक मोटरसाइकिल और एक स्कूटर भी जब्त किया गया।

अमृतसर पुलिस ने पाकिस्तान से 40 किलो हेरोइन की तस्करी के मामले में मुख्य आरोपी को पनाह देने के आरोप में दो महिलाओं समेत तीन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है जिसकी पुष्टिकरण वहाँ रहने वाली एक युवती ने की। 

अपना बयान देकर उस युवती ने अपने ही देश से घोटाला करने वालों को पकड़वाने में पुलिस की मदद की। 

उनकी हिम्मत वाकई प्रशंसनीय है। 


पढ़ कर हिम्मत आई और एहसास हुआ कि मेरा ये कदम सही है और अब पीछे नहीं हटने हैं। 


पर कहते हैं ना वक्त बदलते देर नहीं लगती। 

शायद सब सही ही कह रहे थे कि मुझे दुनियादारी की समझ नहीं हैं कहीं ये एक फैसला हमारी जिंदगी ना बदल दे। 

हम आजाद होकर भी आजाद नहीं है इतना तो मुझे पता हैं पर अब तो बप्पा ही हमारी रक्षा कर सकते हैं। 

मेरे मन में अकस्मात ऐसा ख्याल ना जाने किस तूफान का अंदेशा था?? 


अगले दिन —

किसी अननोन नंबर से कॉल आया। 

कौन??? 

तो क्या सोचा तुमने बयान वापस लेना हैं या जिंदगी प्यारी नहीं है तुम्हें??? 

कॉल कट कर दिया मैंने! 


भले ही इरादा पक्का है मेरा पर ना जाने वो क्या करेगा??? 

फिर भाई और मैं अपने-अपने काम पे चले गए। 

रास्ते में कुछ लोग आए और मेरी गाड़ी जबरदस्ती रूकवा कर बतमीजी करने लगे। 

भाई की जॉब छुड़वा दी। 

रोज-रोज के ड्रामे, हमारा रास्ता रोकना, बतमीजी, जान से मारने की धमकी इन सब से हम परेशान हो चुके थे। 

हाँ, हम गलत नहीं थे पर सब जानते हुए हमारा साथ देने वाला कोई नहीं था। 

और मेरी सहनशीलता की सीमा तब टूटी जब —

एक दिन मैं ट्यूशन से आ रही थी। 

देखा, सब मुझे टकटकी लगा कर घुरे जा रहे हैं और कुछ फुसफुसा रहे हैं जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया है। 

मैं सिर झुका कर घर आ गई। 

घर आकर बैठी ही थी कि मेरी एक फ्रेंड का फोन आया। 


हैलो! 


तू पागल हो गयी है पूरी? तुझे अंदाजा भी है क्या हुआ है? ज़रा भी अक्ल बाकी है तो जाके अभी के अभी अपना स्टेटमेंट वापस ले वरना बहोत पछताऐगी।


अरे! पर हुआ क्या है? 


मुझे तो बोलने में भी शर्म आ रही हैं। 

रूक मैं तुझे फोटो भेजती हूँ! 


कौन सी फोटो? 

तू क्या बोल रही हैं साफ-साफ बोल। 


तू खुद देख ले और मेरी बात मान उनलोगों ने पंगा मत ले।


मैंने फोटो देखा। 

हाथ से मोबाईल गिरा और मैं हक्की-बक्की रह गई। 

क्या मेरी फ्रेंड सही कह रही थी? 

अब मैं क्या करूँ? 

भाई को पता चलेगा तो? 

कुछ समझ नहीं आ रहा था मैं क्या करूँ! 

कमरे के एक कोने में बैठकर घंटों रोती रही। 

शायद ये पहला हादसा था जो मैंने पापा को नहीं बताया था पर बताऊँ भी तो किस मुँह से। 

पर मुझे उनको बताना होगा। 

मैंने पापा को फोन लगाया। 


बच्चा! तुम ठीक हो ना? 


मैं कुछ नहीं बोल पाई और बस रोने लगी और इतना ही कह पाई कि आप जल्दी आ जाओ। 


तुम बिलकुल फिक्र मत करो। मैं और तुम्हारी मम्मी कल सुबह ही आ रहे हैं। 


उसने बात करके अच्छा महसूस हुआ और वो आ रहे हैं ये सुनकर तसल्ली मिली। 

कहते हैं ना मुश्किल वक्त में अगर परिवार साथ हो तो सारी मुश्किल आसान लगने लगती हैं और जल्दी टल जाती हैं। 

अब सब ठीक होगा। 


अगली सुबह —

माँ, पापा! 

सीधे जाके लिपट गई। 

कितने दिनों बाद सुकून मिला। 

मैंने उनको सारी बातें नहीं बताई, शायद हिम्मत नहीं थी इतनी और डर भी था कि कहीं वो मेरी चिंता में यही ना रूक जाए और उनको मैं इन सब में सामिल नहीं करना चाहती हूँ। 

पर बहोत हिम्मत जुटाके मैंने पापा को वो फोटो दिखाई।

वो मेरी ही फोटो थी जो उनलोगों ने अश्लील तरीके से ईडीट करके सोशल मीडिया पे डाल दी थी। 

पापा ने बस इतना कहा कि मुझे पता हैं तुम गलत नहीं हो पर चरित्र लड़की की जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा हैं जिसको कलंकित होते ज्यादा देर नहीं लगती और जब बात उसके चरित्र, उसकी इज्जत पे आ जाए तो सही उठाया हुआ कदम भी गलत साबित होता हैं। 

पर मुझे तुमपे पूरा यकीन हैं। 


उनकी पहचान के एक आदमी को कहकर उन्होंने वो फोटो डिलीट करवा दी। 

अब मुझे एहसास हो रहा था कि शायद मेरा कदम भी गलत हैं, मैं अब सब ठीक कर दूँगी। 

माँ और पापा को अचानक जाना पड़ा।

उनके जाने के बाद मैं पुलिस स्टेशन ही जा रही थी कि मुझे एक फोन आया। 


हैलो! 


कौन? 


मैं इंस्पेक्टर नीरज बोल रहा हूँ, आप वैदिक राठौड़ को जानती हैं? 


हाँ, वो पापा हैं मेरे! 


उनकी गाड़ी का ऐक्सिडेंट हो गया हैं, उनकी 

और साथ में जो महिला थी उनदोनों की मौत हो गयी। 


मेरे पैरों तले जमीन खिसक गयी। 

ये सब भी उनलोगों ने ही करवाया होगा। 

कभी सपने में भी नहीं सोचा था मेरा एक कदम मुझे इतना भारी पड़ेगा। मेरा तो पूरा संसार लूट गया। 


मैं फोैरन वहाँ पहुँची।

उनकी शव जली और मेरे जीने की वजह, मेरी खुशियाँ, मेरा अस्तित्व, मेरा सब कुछ। 


अगले दिन —

सुबह-सुबह पुलिस आई। 


जी! 


देखो, लिज़ा ये ऐक्सिडेंट नहीं मर्डर हैं किसी की सोची समझी चाल। 

तुम्हारे पापा की किसी से दुश्मनी थी? 


नहीं! 


तुम्हें किसी पे शक हैं? 


भाई और मैं एक दूसरे को देखने लगे और साथ में कहा हाँ। 

शायद माँ पापा की मौत का बदला हम दोनों को चाहिए था। 


हमने उनके खिलाफ केम्पेन तो कर दी पर इस बात का भी डर था कि ना जाने ये कदम हमारी जिंदगी में कौन सा मोड़ लाऐगा। 


फिर वही सब हुआ। 

उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी हमारा जीना हराम करने में। 

घर से निकलना तक दुश्वार हो गया था। 

हम उनकी शिकायत लेकर थाने गए। 

और पुलिस कर्मी की सलाह सुनकर हम समझ गए कि हर कोई बिक चुका हैं। 

सच्चाई की जीत तो तब होगी ना जब कोई सच्चा होगा। 


उन्होंने कहा कि — बदमाश देखकर रास्ता बदल दिया कीजिये। 

जब आप जान रही हैं कि वो लोग बड़े लोग हैं, बदमाश हैं तो आपको ज्यादा झाँसी की रानी बनने की क्या जरूरत हैं? 

मेरी सलाह मानिये अपना बयान और अपनी कंप्लेंट लेकर घर जाइए। खुद चैन से रहिये और हमें भी रहने दीजिये। 


मैं कुछ बोलती इससे पहले भाई ने कहा— घर चलो! 

बोलो वहाँ जाता हैं जहाँ आपके बातों को तबज्जो मिले। 

इनसे बहश करने का कोई फायदा नहीं है। 


घर पहुँची। 


आज फिर उस सवाल ने मेरा सारा ध्यान अपनी ओर ले लिया। 


क्या सचमुच हम आजाद हैं??? 


कितने लोगों के संघर्षों, कितने वीर जवानों के बलिदान के बाद हमें आजादी मिली और तब जाकर कितने लोगों की मेहनत, योगदान से हमारा संविधान बना। हमारी रक्षा के लिए, 

आरोपियों को सजा देने के लिए पर क्या फायदा इन सब का आज इन्हीं के कारण हम घुट-घुट के जी रहे हैं। 

एक वो हैं जो दुश्मनों के बीच रहकर भी हमारी जान की सुरक्षा में अपनी कुरबानी दे रहे हैं और एक ये हैं जो समाज में रहकर भी समाज के नहीं हैं। 


पर क्या करती अब मैं? 

वो कहते हैं न जब जीवन में शनि कुंडली मार के बैठे हो तो उसके प्रकोप से कोई नहीं बच सकता। 


शायद इतना तूफान मेरी जिंदगी में काफी नहीं था। 


अगले दिन —

पुलिस हमारे घर आई और बिना कुछ कहे, सुने, पूछे भाई को गिरफ्तार करके ले गई। 

भाई चिल्लाता ही रह गया कि उसने किया क्या हैं। 

जब मैं थाने पहुँची तो पता चला भाई को झूठे बलात्कार करने के जुर्म में अंदर किया गया हैं। 

मैंने और भाई ने उन्हें समझाने की पूरी कोशिश की पर वो हमारी बात सुने तब ना। 

हमें तो ये भी नहीं पता था कि किन सबूतों के आधार पे उन्हें गिरफ्तार किया गया हैं। 

और अगर कोई सबूत नहीं हैं तो क्या उस लड़की के एक आँसू इतने भारी पड़ गए कि वो मेरे भाई का पक्ष सुन ही नहीं रहे। 

सबने लड़कियों को इतना बेचारी साबित कर दिया है कि उनकी झूठ पर भी लोग आँख मूंद कर यकीन कर लेते हैं। 

शायद इसीलिए उसकी एक आँसू के आगे मेरे भाई की अनगिनत आँसूओं का कोई मोल नहीं था। 


भाई, आप ज़रा भी टेंशन मत लेना। 

मैं आपको यहाँ से बहोत जल्दी निकलवाऊँगी।


मैं वकील के पास गयी। 


आप कुछ भी करके भाई को छुड़वा दीजिये। 

आज तो जानते हैं ना वो निर्दोष हैं। 


हाँ! आई नो। 

पर सिर्फ मेरे जानने से कुछ नहीं होगा। बलात्कार का केस बहुत सेंसेटिभ होता हैं। लड़की का पक्ष ज्यादा भारी, उनके जीतने के चान्सेस ज्यादा हैं। 

तुम अभी घर जाओ और फिक्र मत करो मैं पूरी कोशिश करूँगा। 


घर जाते जाते उस सवाल ने मेरा सीना छलनी कर दिया था। 


क्या सचमुच हम आजाद हैं??? 


आज ये सवाल उन लोगों मतलब लड़कों के लिए था जो निर्दोष होकर भी सजा पाते हैं। 

माना लड़कियों पर ज्यादा जुर्म हुए हैं पर इसका मतलब ये तो नहीं ना कि लोग लड़कों की बात तक ना सुने! 

एक तरफ सब कहते हैं हम इक्विटी में यकीन रखते हैं वहीं दूसरी तरफ सब लड़कियों की झूठी दलालों पर यकीन करते हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि वो नारी हैं तो बेचारी हैं। 


मैं भाई की बेगुनाही साबित नहीं कर पाई और उन्हें उम्र कैद की सजा हो गई। 


वो ये सदमा बरदास्त नहीं कर पाए और सबकी तरह मुझे छोड़ कर चले गए। 


मेरे पास कुछ नहीं बचा था। 

सच का साथ देते देते मैंने सबका साथ खो दिया था। 

ना जाने किस गलती की मुझे ये सज़ा मिली??? 

अब किसके लिए लड़ती??? 

उस सच के लिए जिसके कारण मेरी दुनिया छीन गयी??? 


अब हिम्मत नहीं बची थी। 


अगली सुबह—


सर, मैं अपनी स्टेटमेंट और कम्प्लेंट वापस ले रही हूँ। 


मैं छत से कूद गयी।।। 

                  »»——⍟——««



✥और यहाँ सच हार गया और यकीनन हमेशा हारता रहेगा अगर हमने एक कदम सच की तरफ नहीं बढ़ाया। 

परिवर्तन सभी को चाहिए पर हम इस सच को जानते हुए भी नहीं मानते कि बदलाव खुद से शुरू होता हैं। 


❖लिज़ा की कहानी तो खत्म हो गयी। 

पर जिस प्रकार देश में दुष्कर्म, जुर्म बढ़ते ही जा रहे हैं देश की कहानी खत्म होते वक्त नहीं लगेगा। जैसे— बलात्कार, अपहरण, हत्या, लूटपाट, भष्ट्राचार, बाल श्रम, यौन उत्पीड़न, पशु उत्पीड़न, घरेलु हिंसा, अवैध नशीली दवाओं का व्यापार, हथियारों की तस्करी और ना जाने क्या क्या जो हमें भारतीय कहलाने पर शर्मसार करती हैं।

यूँ तो हम कहते हैं विविधता में एकता यही है भारत की विशेषता पर अब भारत में विविधता तो हैं पर एकता नहीं। 

हमें बेशक आजादी मिली और हमने क्या किया देश, राज्य, जाति-पाति, धर्म, रंग, लोग सबका बटवारा कर दिया। 

और जिस दिन हर नागरिक के मन का बटवारा हो गया उस दिन भारत का अस्तित्व खत्म हो जाऐगा और हम हमेशा की तरह हाथ पे हाथ धरे रह जाऐंगे। 

और गर हम भारतीय इन दुष्कर्मों को नहीं रोक पाए तो ऐसी आजादी से बेहतर मौत होगी। 


प्रसून जोशी जी ने कहा हैं —

“मैं रहूँ या ना रहूँ भारत ये रहना चाहिए।”

और आज मैं कहती हूँ —

“मैं रहूँ या ना रहूँ भारत अपने अस्तित्व, अपनी महानता, अपनी संस्कृति, अपनी एकता के साथ रहना चाहिए।”


—श्रेया गुप्ता 

Post a Comment

8 Comments

  1. दिल में दर्द रहता है पर आँखों से नहीं रोता ।। सच को सच कहने वाला ही ।।
    तो आदर्श लेखक है ।।

    ReplyDelete
  2. These words really means a lot to me Sir 😌🙏🙇‍♀️
    Thanks for giving your precious time to read. Keep Supporting ❤

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर श्रेया

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत आभार ❤🙏🙇‍♀️

      Delete
  4. बहुत बढ़िया, बेहतरीन
    बहुत उम्दा लिखा है आपने श्रेया जी

    ReplyDelete
  5. तहे दिल से शुक्रिया। ❤🙇‍♀️

    ReplyDelete
  6. Stories disclosed the reality of the people
    We are not afraid of the criminals
    we are afraid of silence authority's who's promises to safeguard the safety of the people.
    Eye Opening story written by writer.

    ReplyDelete
    Replies
    1. Thank you so much for taking the time to read & leave an excellent review. ❤✨🌷
      Mean a lot 💖

      Delete